Thursday, 15 April 2021

ਲੋਕ ਤੱਥ

 ਕਾਹਦਾ ਸਰਪੰਚ ਜੀਹਦੀ ਕੋਈ ਸੁਣੇ ਨਾ

ਪਾਰਖੂ ਓ ਕਾਹਦਾ ਦੁੱਧੋਂ ਪਾਣੀ ਪੁਣੇ ਨਾ


ਪੁੱਤ ਕਾਹਦਾ ਜਿਹੜਾ ਮਾਂ ਪਿਓ ਅੱਗੇ ਬੋਲਦਾ

ਕਾਹਦਾ ਓਹੋ ਬਾਣੀਆ ਜੋ ਸੌਦਾ ਪੂਰਾ ਤੋਲਦਾ


ਵਪਾਰ ਨਹੀਓਂ ਹੁੰਦਾ ਬਿਨਾਂ ਝੂਠ ਮਾਰੇ ਤੋਂ

ਮੁਰਾਦ ਪੂਰੀ ਹੋਵੇ ਨਾ ਜੀ ਟੁੱਟੇ ਤਾਰੇ ਤੋਂ


ਸਦਾ ਫ਼ਲ ਵਾਲੇ ਰੁੱਖ ਨੂੰ ਹੀ ਰੋੜੇ ਵੱਜਦੇ

ਪੁਲਿਸ ਨੂੰ ਵੇਖ ਚੋਰ ਮੱਲੋ ਮੱਲੀ ਭੱਜਦੇ


ਨੰਗ ਬੰਦਾ ਬਿਨਾਂ ਗੱਲੋਂ ਭਾਲਦਾ ਲੜਾਈ

ਪਿੰਡ ਚ ਨਾ ਕੁੱਤੀ ਪੁੱਛੇ ਕਾਹਦੀ ਓ ਚੜਾਈ


ਖੇਡ ਵਿੱਚ ਹਾਰਕੇ ਨਹੀਂ ਰੌਲਾ ਪਾਈਦਾ

ਭੁੱਖੋਂ ਵੱਧ ਕਦੇ ਨਹੀਂ ਜੀ ਖਾਣਾ ਖਾਈਦਾ


ਬਾਹਲੇ ਦਿਨ ਸੋਹਰੀਆਂ ਦੇ ਪਿੰਡ ਰਹੀਏ ਨਾ

ਬੇਗਾਨੇ ਘਰੇ ਜਾਕੇ ਚੌਂਕੇ ਵਿੱਚ ਬਹੀਏ ਨਾ


ਚੱਕਮੀ ਜੀ ਨਾਰ ਓਦੋਂ ਪੱਟ ਦਿੰਦੀ ਘਰ ਨੂੰ

ਆਪਣੇ ਨੂੰ ਛੱਡ ਜਾਵੇ ਜਦੋਂ ਦੁੱਜੇ ਦਰ ਨੂੰ


ਪਤੀ ਛੱਡ ਰੱਖੇ ਜਿਹੜੀ ਬਹੁਤੇ ਯਾਰ ਜੀ

ਸੱਥ ਵਿੱਚ ਉੱਚੀ ਬੋਲੇ ਰੰਨ ਬਦਕਾਰ ਜੀ


ਨਸ਼ਾ ਖਾਣ ਵਾਲੇ ਨੂੰ ਹੀ ਨਸ਼ਾ ਖਾਂਦਾ ਏ

ਆਸ਼ਿਕ ਮਾਸ਼ੂਕ ਗਲੀ ਵਾਰ ਵਾਰ ਜਾਂਦਾ ਏ


ਪਰਿਵਾਰ ਸੁਖੀ ਹੋਵੇ ਨਾ ਕੰਜੂਸ ਬੰਦੇ ਦਾ

ਅੰਤ ਸਦਾ ਮਾੜਾ ਹੁੰਦਾ ਮਾੜੇ  ਧੰਧੇ ਦਾ


ਮੁਸੀਬਤ ਜੇ ਕੋਲੇ ਆਜੇ ਫ਼ੇਰ ਨਾ ਡਰੋ

ਬਾਹਲਾ ਦੋਗਲੇ ਜੇ ਬੰਦੇ ਤੇ ਭਰੋਸਾ ਨਾ ਕਰੋ


ਬਾਹਲਾ ਪੈਸਾ ਖੋਹ ਲੈਂਦਾ ਸੁੱਖ ਚੈਨ ਨੂੰ

ਜਹਾਨ ਉੱਤੇ ਹੈਨੀ ਥਾਂ ਸਦਾ ਰਹਿਣ ਨੂੰ


ਪਾਗਲਾ ਓਏ ਕਰਿਆ ਹੰਕਾਰ ਮਾੜਾ ਏ

ਇੱਜਤ ਤਕਾਵੇ ਯਾਰ ਦੀ ਓ ਯਾਰ ਮਾੜਾ ਏ


ਸਤਿਕਾਰ ਨਾਲ ਬੁਲਾਈਏ ਆਪਣੇ ਤੋਂ ਬੜੇ ਨੂੰ

ਪਉੜੀ ਖਿੱਚ ਸਿੱਟੀਏ ਨਾ ਉਤਾਂ ਚੜੇ ਨੂੰ


ਹੋ ਮਾੜੀਆਂ ਦਰਾਂ ਦੇ ਅੱਗੇ ਲਾਈਆਂ ਬੇਰੀਆਂ

ਸੁੰਦਰਪੁਰੀਆ ਓਏ ਗੱਲਾਂ ਜਵਾਂ ਸੱਚ ਤੇਰੀਆਂ


✍️ਪਾਗਲ ਸੁੰਦਰਪੁਰੀਆ

9649617982




Wednesday, 14 April 2021

भारत रत्न बाबा साहेब डॉ भीमराव आम्बेडकर

 


14 अप्रैल 2021 मेरे लिए बहुत खास दिन है क्यूंकि आज एक बाबा की जयंती है। बाबा का मतलब कोई पाखंडी साधु नहीं, जो सच में बाबा थे. 

मैं तो कहता हूं कि अगर आप कोई धार्मिक तीर्थ के दर्शन करने लिए मीलों का सफ़र तय करते हैं। उससे अच्छा यह है कि आप बाबा साहेब की या कोई भी महापुरुष , विद्वान, संत, जिसने जीवन में संघर्ष किया हो उसके जीवन के दर्शन कर लेने चाहिए। घर में रहकर किसी महापुरुष की जीवनी पढ़ लेना और उस जीवनी से सीख लेना बहुत बड़ा तीर्थ दर्शन हो जाता है। 

आज से 130 वर्ष पहले 14 अप्रैल 1891 को सूबेदार रामजी सकपाल के घर माता भीमाबाई की कोख से भिवा ने जन्म लिया था जो भविष्य में भारत रत्न बाबा साहेब डॉ. भीमराव आम्बेडकर के नाम से पूरे विश्व में प्रसिद्ध हुए। बाबा साहेब का परिवार हिन्दू महार जाति से सम्बन्धित था जिसे उस वक्त अछूत कहा जाता था। उनका परिवार कबीर पंथ को मानता था।  बाबा साहेब के पूर्वज भी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में थे। बाबा साहेब का जन्म मध्यप्रदेश के महु नगर (अब डॉ. आम्बेडकर नगर) की छावनी में हुआ क्यूंकि उनके पिता भारतीय सेना में कार्यरत थे। लेकिन उनका पैतृक गांव महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में आंबड़वे था। बाबा साहेब जब पांच वर्ष के थे तो उनकी माता का निधन हो गया तो उनका पालन पोषण उनकी भुआ ने किया था,  भारत के संविधान के पिता बाबा साहेब दुनियां के प्रमुख विद्वानों में एक थे और भारत में तो वे सिर्फ़ एक ही थे। 

बाबा साहेब एक विचारधारा तथा दर्शन हैं। स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा, बौद्ध धर्म, विज्ञानवाद, मानवतावाद, सत्य, अहिंसा आदि के विषय बाबा साहेब के सिद्धान्त हैं। छुआछूत को नष्ट करना, दलितों में सामाजिक सुधार, भारत में बौद्ध धर्म का प्रचार एवं प्रचार, भारतीय संविधान में निहीत अधिकारों तथा मौलिक हकों की रक्षा करना, एक नैतिक तथा जातिमुक्त समाज की रचना और भारत देश प्रगती यह प्रमुख उद्देश शामील हैं। आम्बेडकरवाद सामाजिक, राजनितीक तथा धार्मिक विचारधारा हैं। जो उस समाज के कोने से निकली है जो समाज पिछले पांच हजार सालों से मनुवादी सोच द्वारा शोषित करके दबाया गया था, जिस समाज को आज हम दलित, पिछड़ावर्ग कहते है। जिसे पहले हरिजन या शूद्र, अछूत कहा जाता था। दलित समाज का मुख्य समाज से पीछे रहने या इस समाज से दूसरे समाज के नफ़रत करने का मुख्य कारण हिन्दू धर्म का प्राचीन धर्मशास्त्र मनुस्मृति ही रहा है। ओशो अपनी एक किताब में जिक्र करते है की ब्राह्मणों ने हज़ारों वर्षों से कहा था कि तुम शूद्र हो तुम्हारा काम गन्दगी साफ करना ही है और शूद्रों ने भी हजारों वर्षों से मान रखा था कि हम शूद्र है इसलिए ज्ञानी नहीं बन सकते,। यह बात सत्य है कि बाबा साहेब ने उस बेड़ी को तोड़ा है, आगे ओशो लिखते है कि क्यों इससे पहले के हज़ारों वर्ष कोई आम्बेडकर पैदा नहीं हुआ क्यूंकि मनुवादियों ने कभी पैदा नहीं होने दिया, वो कहावत सच में सच हो गई "कोयले की खानों से ही हीरे निकलते हैं" बाबा साहेब का धर्म परिवर्तन करने कारण भी यही था, क्यूंकि बाबा साहेब अक्सर कहते थे "हालांकि मैं एक अछूत हिन्दू के रूप में पैदा हुआ हूँ, लेकिन मैं एक हिन्दू के रूप में हरगिज नहीं मरूँगा" कि जिस धर्म में सबके लिए समानता नहीं है तो उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया क्यूंकि बौद्ध धर्म के मूल सिद्धान्त बुद्धि का प्रयोग, प्यार, समानता थी और है। लेकिन एक बात ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि बाबा साहेब का परिवार कबीर पंथ को मानता था, बाबा साहेब व उनका का परिवार संत कबीर की विचारधारा से बहुत प्रभावित था तथा संत कबीर के ज्ञान को आधार बनाकर जीवन जीते थे। संत कबीर  ने पाखंडवाद तथा सामाजिक बुराइयों जैसे जातिवाद, गलत धार्मिक मान्यताएं, जीव हिंसा, नशाखोरी आदि को दूर किया। और संत कबीर भी हिन्दू धर्म की रूढ़िवादी सोच के खिलाफ थे, तो फिर बाबा साहेब ने बौद्ध धर्म क्यों अपनाया? इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि बाबा साहेब के परिवारिक मित्र एवं लेखक दादा केलुस्कर द्वारा खुद की लिखी 'बुद्ध की जीवनी' उन्हें भेंट दी गयी। इसे पढकर उन्होंने पहली बार गौतम बुद्ध व बौद्ध धर्म को जाना एवं उनकी शिक्षा से प्रभावित हुए थे और दूसरा कारण यह हो सकता है कि वे अपने सिद्धान्त के अनुसार स्वतंत्र होने के कारण जो उन्हें ज्यादा प्रभावशाली लगा इसलिए उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया, बाबा साहेब की महान सोच और उनके जीवन के बारे में कोई भी लेखक एक घण्टे, एक दिन, एक सप्ताह, एक महीने, एक साल में समझ कर व्याख्या करके लिख से ऐसा मुमकिन नहीं है। बाबा साहेब की दो पत्नियां थीं पहली पत्नी रमाबाई वह जिससे पांचवीं में पढ़ते वक्त 1906 में बाल विवाह हुआ और गंभीर बीमारी के चलते रमाबाई का 1935 निधन हो गया था। बाबा साहेब जब भारतीय संविधान के मसौदे को पूरा करने के बाद नीन्द की कमी से पीड़ित हो गए थे , उनके पैरों में न्यूरोपैथिक दर्द था, और इंसुलिन और होम्योपैथिक दवाएं ले रहे थे। वह इलाज के लिए मुम्बई गए, और वहां डॉक्टर शारदा कबीर से मिले, जो 15 अप्रैल 1948 के बाद उनकी दूसरी पत्नी हुई, विवाह के बाद डॉ शारदा कबीर ने बाद में अपना नाम सविता आम्बेडकर अपनाया, बाबा साहेब के चार पुत्र एवं एक पुत्री थीं, यशवंत आम्बेडकर को छोड़कर सभी बच्चों की बचपन में मृत्यु हो गई थी। बाबा साहेब गौतम बुद्ध, संत कबीर, महात्मा ज्योतिराव फूले तीनों को अपना गुरु मानते थे। बाबा साहेब की मेहनत से पूरे भारत के लोगों को संविधान ने समानता, स्वतंत्रता, मूल अधिकार मिले है जिसकी वजह से महिलाएं , दलित, आदिवासी भी मुख्य भूमिका में कार्य कर रहे है। लेकिन ये सिर्फ़ कानून की नज़रों में, आज भी कुछ स्वर्ण लोग दलितों को स्वीकार नहीं करते, वैसे तो बाबा साहेब को भारत सरकार द्वारा भारतरत्न से नवाजा गिया है पर भारत के स्वर्ण लोग दलितों को अपने समान समझेंगे, असल में बाबा साहेब की विचारधारा उस दिन खुश होगी, अब मुझे भारत के लोगों ने भारत रत्न दिया है। 


बाबा साहेब की शिक्षा :-

7 नवम्बर 1900 को रामजी सकपाल ने सातारा की गवर्न्मेण्ट हाइस्कूल (अब प्रताप हाई स्कूल) में अपने बेटे भीमराव का नाम भिवा रामजी आंबडवेकर दर्ज कराया। उनके बचपन का नाम 'भिवा' था। आम्बेडकर का मूल उपनाम सकपाल की बजाय आंबडवेकर लिखवाया था, जो कि

उनके आंबडवे गाँव से संबंधित था। क्योंकी कोकण प्रांत के लोग अपना उपनाम गाँव के नाम से रखते थे, अतः आम्बेडकर के आंबडवे गाँव से आंबडवेकर उपनाम स्कूल में दर्ज करवाया गया। बाद में एक देवरुखे ब्राह्मण शिक्षक कृष्णा महादेव आंबेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे, ने उनके नाम से 'आंबडवेकर' हटाकर अपना सरल 'आंबेडकर' उपनाम जोड़ दिया। तब से आज तक वे आंबेडकर नाम से जाने जाते हैं।

बचपन के दिनों में बाबा साहेब को अपनी दिनचर्या जाति के कारण समाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता था, स्कूल में पढ़ाई के समय भी उन्हें छुआछूत के कारण क्लास से बाहर कर दिया जाता था। परन्तु आज महाराष्ट्र में 7 नवम्बर (यानी जिस दिन बाबा साहेब का स्कूल में  नाम दर्ज हुआ था) को विद्यार्थी दिवस मनाया जाता है। हां उस दिन बाबा साहेब को भिवा कहकर संबोधन किया जाता है। जब वे अंग्रेजी चौथी कक्षा की परीक्षा उत्तीर्ण हुए, तब क्योंकि यह अछूतों में असामान्य बात थी, इसलिए भीमराव की इस सफलता को अछूतों के बीच सार्वजनिक समारोह के रूप में मनाया गया, और उनके परिवार के मित्र एवं लेखक दादा केलुस्कर द्वारा खुद की लिखी 'बुद्ध की जीवनी' उन्हें भेंट दी गयी। इसे पढकर उन्होंने पहली बार गौतम बुद्ध व बौद्ध धर्म को जाना एवं उनकी शिक्षा से प्रभावित हुए। रामजी सकपाल परिवार के साथ बंबई (अब मुंबई) चले गए। अप्रैल 1906 में, जब भीमराव लगभग 15 वर्ष आयु के थे, तो नौ साल की लड़की रमाबाई से उनकी शादी कराई गई थी। तब वे पांचवी अंग्रेजी कक्षा में पढ़ रहे थे। उन दिनों भारत में बाल-विवाह का प्रचलन था और उसके बाद बाबा साहेब ने माध्यमिक शिक्षा गवर्मेंट हाईस्कूल मुंबई से व 1912 तक, उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान में कला स्नातन (बी॰ए॰) प्राप्त की, और बड़ौदा राज्य सरकार के साथ काम करने लगे। 1913 में, आम्बेडकर 22 साल की आयु में संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए जहां उन्हें सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय (बड़ौदा के गायकवाड़) द्वारा स्थापित एक योजना के तहत न्यूयॉर्क शहर स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर शिक्षा के अवसर प्रदान करने के लिए तीन साल के लिए 11.50 डॉलर प्रति माह बड़ौदा राज्य की छात्रवृत्ति प्रदान की गई थी। वहां पहुँचने के तुरन्त बाद वे लिविंगस्टन हॉल में पारसी मित्र नवल भातेना के साथ बस गए। जून 1915 में उन्होंने अपनी कला स्नातकोत्तर (एम॰ए॰) परीक्षा पास की, जिसमें अर्थशास्त्र प्रमुख विषय, और समाजशास्त्र, इतिहास, दर्शनशास्त्र और मानव विज्ञान यह अन्य विषय थे। उन्होंने स्नातकोत्तर के लिए एंशियंट इंडियन्स कॉमर्स (प्राचीन भारतीय वाणिज्य) विषय पर शोध कार्य प्रस्तुत किया।

1916 में, उन्हें अपना दूसरा शोध कार्य, नेशनल डिविडेंड ऑफ इंडिया - ए हिस्टोरिक एंड एनालिटिकल स्टडी के लिए दूसरी कला स्नातकोत्तर प्रदान की गई, और अन्ततः उन्होंने लंदन की राह ली। 1916 में अपने तीसरे शोध कार्य इवोल्युशन ओफ प्रोविन्शिअल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया के लिए अर्थशास्त्र में पीएचडी प्राप्त की, अपने शोध कार्य को प्रकाशित करने के बाद 1927 में अधिकृत रुप से पीएचडी प्रदान की गई। 9 मई को, उन्होंने मानव विज्ञानी एलेक्सजेंडर गोलदनवेजर द्वारा आयोजित एक सेमिनार में भारत में जातियां उनकी प्रणाली, उत्पत्ति और विकास नामक एक शोध पत्र प्रस्तुत किया, जो उनका पहला प्रकाशित पत्र था। 3 वर्ष तक की अवधि के लिये मिली हुई छात्रवृत्ति का उपयोग उन्होंने केवल दो वर्षों में अमेरिका में पाठ्यक्रम पूरा करने में किया और 1916 में वे लंदन गए, और वहाँ उन्होंने ग्रेज़ इन में बैरिस्टर कोर्स (विधि अध्ययन) के लिए प्रवेश लिया, और साथ ही लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भी प्रवेश लिया जहां उन्होंने अर्थशास्त्र की डाॅक्टरेट थीसिस पर काम करना शुरू किया। जून 1917 में, विवश होकर उन्हें अपना अध्ययन अस्थायी तौरपर बीच में ही छोड़ कर भारत लौट आए क्योंकि बड़ौदा राज्य से उनकी छात्रवृत्ति समाप्त हो गई थी।बड़ौदा राज्य के सेना सचिव के रूप में काम करते हुये अपने जीवन में अचानक फिर से आये भेदभाव से डॉ॰ भीमराव आम्बेडकर निराश हो गये और अपनी नौकरी छोड़ एक निजी ट्यूटर और लेखाकार के रूप में काम करने लगे। यहाँ तक कि उन्होंने अपना परामर्श व्यवसाय भी आरम्भ किया जो उनकी सामाजिक स्थिति के कारण विफल रहा। अपने एक अंग्रेज जानकार मुंबई के पूर्व राज्यपाल लॉर्ड सिडनेम के कारण उन्हें मुंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स मे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिल गयी। 1920 में कोल्हापुर के शाहू महाराज, अपने पारसी मित्र के सहयोग और कुछ निजी बचत के सहयोग से वो एक बार फिर से इंग्लैंड वापस जाने में सफ़ल हो पाए तथा 1921 में विज्ञान स्नातकोत्तर (एम॰एससी॰) प्राप्त की, जिसके लिए उन्होंने 'प्रोवेन्शियल डीसेन्ट्रलाईज़ेशन ऑफ इम्पीरियल फायनेन्स इन ब्रिटिश इण्डिया' (ब्रिटिश भारत में शाही अर्थ व्यवस्था का प्रांतीय विकेंद्रीकरण) खोज ग्रन्थ प्रस्तुत किया था। 1922 में, उन्हें ग्रेज इन ने बैरिस्टर-एट-लॉज डिग्री प्रदान की और उन्हें ब्रिटिश बार में बैरिस्टर के रूप में प्रवेश मिल गया। 1923 में, उन्होंने अर्थशास्त्र में डी॰एससी॰ (डॉक्टर ऑफ साईंस) उपाधि प्राप्त की। उनकी थीसिस "दी प्राब्लम आफ दि रुपी: इट्स ओरिजिन एंड इट्स सॉल्यूशन" (रुपये की समस्या: इसकी उत्पत्ति और इसका समाधान) पर थी। लंदन का अध्ययन पूर्ण कर भारत वापस लौटते हुये भीमराव आम्बेडकर तीन महीने जर्मनी में रुके, जहाँ उन्होंने अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन, बॉन विश्वविद्यालय में जारी रखा। किंतु समय की कमी से वे विश्वविद्यालय में अधिक नहीं ठहर सकें। उनकी तीसरी और चौथी डॉक्टरेट्स (एलएल॰डी॰, कोलंबिया विश्वविद्यालय, 1952 और डी॰लिट॰, उस्मानिया विश्वविद्यालय, 1953) सम्मानित उपाधियाँ थीं, बाबा साहेब का राजनीतिक कैरियर 1926 में शुरू हुआ और 1956 तक वो राजनीतिक क्षेत्र में विभिन्न पदों पर रहे। दिसंबर 1926 में, मुंबई के गवर्नर ने उन्हें मुंबई विधान परिषद के सदस्य के रूप में नामित किया, उन्होंने अपने कर्तव्यों को गंभीरता से लिया, और अक्सर आर्थिक मामलों पर भाषण दिये। वे 1936 तक बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य थे। उसके बाद ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन एक सामाजिक-राजनीतिक संगठन था जिसकी स्थापना दलित समुदाय के अधिकारों के लिए अभियान चलाने के लिए 1942 में आंबेडकर द्वारा की गई थी। वर्ष 1942 से 1946 के दौरान, आंबेडकर ने रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे।

आम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक पार्टी को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन (शेड्युल्ड कास्ट फेडरेशन) में बदलते देखा, हालांकि 1946 में आयोजित भारत के संविधान सभा के लिए हुये चुनाव में खराब प्रदर्शन किया। बाद में वह बंगाल जहां मुस्लिम लीग सत्ता में थी वहां से संविधान सभा में चुने गए थे।

गांधी व कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद आम्बेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण जब, 15 अगस्त 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व में आई तो उसने बाबा साहेब को देश के पहले क़ानून एवं न्याय मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त 1947 को, बाबा साहेब को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। इस कार्य में बाबा साहेब का शुरुआती बौद्ध संघ रीतियों और अन्य बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन भी काम आया।आम्बेडकर एक बुद्धिमान संविधान विशेषज्ञ थे, उन्होंने लगभग 60 देशों के संविधानों का अध्ययन किया था। बाबा साहेब को "भारत के संविधान का पिता" के रूप में मान्यता प्राप्त है। बाबा साहेब द्वारा तैयार किए गए संविधान के पाठ में व्यक्तिगत नागरिकों के लिए नागरिक स्वतंत्रता की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए संवैधानिक गारंटी और सुरक्षा प्रदान की गई है, जिसमें धर्म की आजादी, छुआछूत को खत्म करना, और भेदभाव के सभी रूपों का उल्लंघन करना शामिल है। बाबा साहेब ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों के लिए तर्क दिया, और अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के सदस्यों के लिए नागरिक सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों में नौकरियों के आरक्षण की व्यवस्था शुरू करने के लिए असेंबली का समर्थन जीता, जो कि सकारात्मक कार्रवाई थी। भारत के सांसदों ने इन उपायों के माध्यम से भारत की निराशाजनक कक्षाओं के लिए सामाजिक-आर्थिक असमानताओं और अवसरों की कमी को खत्म करने की उम्मीद की। संविधान सभा द्वारा 26 नवंबर 1949 को संविधान अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को देश लागू कर दिया गया। बाबा साहेब दो बार भारतीय संसद के ऊपरी सदन राज्य सभा में महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाले भारत की संसद के सदस्य बने थे। राज्यसभा सदस्य के रूप में उनका पहला कार्यकाल 3 अप्रैल 1952 से 2 अप्रैल 1956 के बीच था, और उनका दूसरा कार्यकाल 3 अप्रैल 1956 से 2 अप्रैल 1962 तक आयोजित किया जाना था, लेकिन कार्यकाल समाप्त होने से पहले, 6 दिसंबर 1956 को उनका निधन हो गया। लेकिन वो उनकी शारीरिक मौत थी, बाबा साहेब आज भी वैचारिक रूप से जिन्दा हैं।

जय बाबा साहेब

जय भीम

बाबा साहेब के बारे में लिखने और पढ़ने व उनकी जीवनी से सीखने को सौभाग्य प्राप्त हुआ, मैं अपने आप को खुश नसीब समझता हूं। बाबा साहेब कहते थे -----

" जीवन चाहे छोटा हो.... लेकिन महान होना चाहिए।


बाबा साहेब आपके बारे में लिखते हुए शब्दों में गलतियां रही हों बाबा साहेब आगे से मुझे सद्बुद्धि देना।

लेखक - ✍️पागल सुंदरपुरीया

9649617982


Tuesday, 13 April 2021

ਕਹਾਣੀ - ਅੰਨਦਾਤਾ

ਦੋ ਧੀਆਂ ਅਤੇ ਇੱਕ ਪੁੱਤਰ ਦਾ ਬਾਪ ਚਾਨਣ ਸਿੰਘ ਜਿਸਦੀ ਘਰਵਾਲੀ ਕੈਂਸਰ ਦੀ ਬਿਮਾਰੀ ਕਾਰਨ ਸਵਰਗਵਾਸ ਹੋ ਗਈ ਸੀ । ਘਰਵਾਲੀ ਦੀ ਬਿਮਾਰੀ ਦੇ ਕਰਕੇ ਬੈਂਕ ਤੋਂ ਬਣੀ ਕ੍ਰੋਪ ਲੋਨ ਵਾਲਾ ਖਾਤਾ ਡਿਫਾਲਟਰ ਹੋ ਗਿਆ ਸੀ ,। ਪਰ ਵੱਡੀ ਕੁੜੀ ਦਾ ਵਿਆਹ ਕਰਨਾ ਸੀ ਤਾਂ ਚਾਨਣ ਸਿੰਘ ਨੇ ਟ੍ਰੈਕਟਰ ਕਿਸ਼ਤਾਂ ਤੇ ਲੈਕੇ ਨਗਦੀ ਵਿੱਚ ਵੇਚ ਦਿੱਤਾ । ਥੋੜੇ ਦਿਨਾਂ ਬਾਅਦ ਬੈਂਕ ਅਤੇ ਟ੍ਰੈਕਟਰ ਫਾਇਨਾਂਸ ਕੰਪਨੀ ਵਾਲੇ ਘਰੇ ਗੇੜੇ ਮਾਰਨ ਲੱਗੇ । ਓਦਰ ਵੱਡੀ ਕੁੜੀ ਦੇ ਵਿਆਹ ਦਾ ਕਾਰਜ ਵੀ ਕਰਨਾ ਸੀ ਕਿਉਂਕਿ ਮੁੰਡੇ ਵਾਲੀਆਂ ਦੀ ਖੁਵਾਇਸ਼ ਵੱਡੀ ਗੱਡੀ ਅਤੇ ਸੋਹਣੇ ਦਾਜ਼ ਦੀ ਸੀ, ਜਿਸ ਦਿਨ ਕੁੜੀ ਦੇ ਅਨੰਦ ਕਾਰਜ ਹੋਣੇ ਸੀ ਉਸਤੋਂ ਇੱਕ ਦਿਨ ਪਹਿਲਾਂ ਡਾਕੀਏ ਨੇ ਇੱਕ ਚਿੱਠੀ ਦਿੱਤੀ ਜਿੱਸ ਵਿੱਚ ਚਾਨਣ ਸਿੰਘ ਦੀ ਜਮੀਨ ਨਿਲਾਮੀ ਦੀ ਸੂਚਨਾ ਸੀ। ਏ ਗੱਲ ਪੜ੍ਹਦੇ ਹੀ ਚਾਨਣ ਸਿੰਘ ਅੰਦਰ ਤੱਕ ਹਿਲ ਗਿਆ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਸੰਭਾਲਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਨ ਲੱਗਾ ਪਰ ਸਮਾਜ ਅਤੇ ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰਾਂ ਵਿੱਚ ਆਪਣੀ ਬਦਨਾਮੀ ਹੋਣ ਤੋਂ ਡਰਨ ਲਗਾ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਖੇਤ ਪਾਣੀ ਮੋੜਨ ਦਾ ਬਹਾਨਾਂ ਲਾਕੇ ਚੱਲਾ ਗਿਆ ਅਤੇ ਮੁੜ ਨਾ ਆਇਆ । ਚਾਨਣ ਸਿੰਘ ਨੇ ਮੋਟਰ ਤੇ ਲੱਗੇ ਤੂਤ ਨਾਲ ਰੱਸਾ ਪਾਕੇ ਫਾਹਾ ਲੈ ਲਿਆ। ਚਾਨਣ ਸਿੰਘ ਆਪਣੇ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਅਨਾਥ ਕਰਕੇ ਤੁਰ ਗਿਆ। ਚਾਨਣ ਸਿੰਘ ਦੇ ਬੱਚਿਆਂ ਕੋਲ ਨਾ ਆਪਣਾ ਬਾਪ ਰਿਹਾ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਦਾਦੇ ਪੜਦਾਦਿਆਂ ਦੀ ਜੱਦੀ ਜਮੀਨ ਰਹੀ। ਚਾਨਣ ਸਿੰਘ ਅੰਨਦਾਤਾ ਹੋਕੇ ਵੀ ਆਪਣੇ ਬੱਚਿਆਂ ਭੁੱਖੇ ਮਰਨ ਤੇ ਮਜ਼ਬੂਰ ਕਰ ਗਿਆ । 

✍️ਪਾਗਲ ਸੂੰਦਰਪੁਰੀਆ

9649617982


ਕਹਾਣੀ --- ਲੰਬੜਦਾਰੀ

 ਸੁੱਚਾ ਸਿੰਘ ਲੰਬੜਦਾਰ ਦੇ ਨੋਹ, ਪੁੱਤ, ਪੋਤੇ ਭਾਂਵੇ ਸਿੱਧੇ ਮੂੰਹ ਨਹੀਂ ਬੋਲਦੇ ਸਨ ਪਰ ਅੱਜ ਵੀ ਲੰਬੜਦਾਰ ਨੂੰ ਪਿੰਡ ਦੇ ਲੋਕ ਪੂਰੀ ਇੱਜਤ ਦਿੰਦੇ ਸੀ। ਲੰਬੜਦਾਰ ਦੀ ਸਿਆਣਪ ਦੇ ਚਰਚੇ ਆਸੇ ਪਾਸੇ ਦੇ ਪਿੰਡਾਂ ਵਿੱਚ ਹੁੰਦੇ ਸੀ, ਇਸ ਕਰਕੇ ਦੋ ਭਰਾਵਾਂ ਦੀ ਇੱਕ ਪੰਚਾਇਤੀ ਵਿੱਚ ਲੰਬੜਦਾਰ ਨੂੰ ਸੱਦਿਆ ਗਿਆ। ਸੱਥ ਵਿੱਚ ਪੰਚਾਇਤ ਬੈਠੀ ਸੀ ਪਰ ਲੋਕ ਲੰਬੜਦਾਰ ਨੂੰ ਉਡੀਕ ਰਹੇ ਸੀ। ਥੋੜ੍ਹੀ ਦੇਰ ਵਿੱਚ ਲੰਬੜਦਾਰ ਖੂੰਡੇ ਦਾ ਸਹਾਰਾ ਲੈਕੇ ਸੱਥ ਵਿੱਚ ਪੁੱਜ ਗਿਆ। ਸ਼ਿੰਦਾ ਅਤੇ ਭਿੰਦਾ ਨਾਂ ਦੇ ਦੋ ਭਰਾਵਾਂ ਦੀ ਜਮੀਨ ਦੀ ਵੰਡ ਦਾ ਰੌਲਾ ਸੀ। ਭਿੰਦਾ ਚੰਗੀ ਜਮੀਨ ਦੀ ਮੰਗ ਕਰਦਾ ਸੀ ਅਤੇ ਸ਼ਿੰਦਾ ਬਰਾਬਰ ਦਾ ਹੱਕ ਮੰਗਦਾ ਸੀ ਪਰ ਮੈਂਬਰ ਸਰਪੰਚ ਆਪਣੇ ਖਾਸ ਭਿੰਦੇ ਦੀ ਗੱਲ ਨੂੰ ਜਿਆਦਾ ਤਵੱਜੋ ਦਿੰਦੇ ਸੀ ਤਾਂ ਲੰਬੜਦਾਰ ਨੇ ਮੈਂਬਰ ਸਰਪੰਚ ਨੂੰ ਟੋਕ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਕਿਹਾ ਪਿੰਡ ਵਾਲਿਓ ਅਸਲ ਗੱਲ ਏ ਹੈ ਕਿ ਵੰਡ ਚੰਗੀ ਮਾੜੀ ਜਮੀਨ ਦੇਖਕੇ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇ, ਤਾਂ ਕੇ ਸ਼ਿੰਦੇ ਅਤੇ ਭਿੰਦੇ ਦੋਹਾਂ ਨੂੰ ਕੋਈ ਘਾਟਾ ਨਾ ਲੱਗੇ,, ਸਾਰੇ ਲੋਕ ਸਹਿਮਤ ਹੋ ਗਏ ਪਰ ਭਿੰਦਾ ਸਿਰਫ਼ ਚੰਗੀ ਜਮੀਨ ਦੀ ਜਿੱਦ ਕਰਨ ਲੱਗਾ। ਪਰ ਗੱਲ ਲੰਬੜਦਾਰ ਦੀ ਜੁਬਾਨ ਚੋਂ ਨਿਕਲੀ ਸੀ ਇਸ ਲਈ ਭਿੰਦੇ ਨੂੰ ਮੋੜਨੀ ਔਖੀ ਹੋ ਗਈ। ਐਨੇ ਵਿੱਚ ਦੀ ਭਿੰਦੇ ਦਾ ਸੀਰੀ ਬੋਲਿਆ, ਬਾਈ ਭਿੰਦੇ ਤੂੰ ਕੀਹਦੀ ਗੱਲ ਨਾਲ ਸਹਿਮਤ ਹੋਈ ਜਾਣਾ, 'ਲੰਬੜਦਾਰ ਦੀ। ਏ ਥੋੜ੍ਹੀ ਲੜਾਈ ਮੁਕਾਉਗਾ, ਲੰਬੜਦਾਰ?? ਓਏ ਲੋਕੇ ਲੰਬੜਦਾਰ ਦੀ ਆਪਣੇ ਘਰੇ ਤਾਂ ਪੁੱਛ ਪੜਤਾਲ ਹੈਨੀ ਗੀ, ਘਰੇ ਰੋਜ਼ ਇਹਦੇ ਨਾਲ ਕੁੱਤੇ ਖਾਣੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਵੱਡਾ ਲੰਬੜਦਾਰ..! ਘਰੇ ਗੋਲਾਪੁਣਾ ਬਾਹਰ ਲੰਬੜਦਾਰੀਆਂ,, ਭਿੰਦੇ ਦੇ ਸੀਰੀ ਦੀਆਂ ਗਲਾਂ ਲੰਬੜਦਾਰ ਦੇ ਸੀਨੇ ਛੁਰੀਆਂ ਵਾਂਗੂੰ ਵੱਜੀਆਂ, ਅਤੇ ਚੁੱਪ ਚਪੀਤਾ ਸੱਥ ਚੋਂ ਘਰ ਆਕੇ ਆਪਣੀ ਘਰਵਾਲੀ ਕਰਤਾਰੋ ਕੋਲ ਬੈਠ ਗਿਆ, ਕਰਤਾਰੋ ਨੇ ਪੁੱਛਿਆ, ਕਿ ਗੱਲ ਸਰਦਾਰਾ ਬੋਲਦਾ ਨਹੀਂ? ਲੰਬੜਦਾਰ ਦੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਚੋਂ ਪਾਣੀ ਡਿਗੱਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋ ਗਿਆ। ਕਰਤਾਰੋ ਨੇ ਪਾਣੀ ਫੜਾਕੇ ਫੇਰ ਪੁੱਛਿਆ। ਸਰਦਾਰਾ ਕਿ ਗੱਲ ਹੈ? ਰੋਂਦਾ ਰੋਂਦਾ ਲੰਬੜਦਾਰ ਕਹਿੰਦਾ ਅੱਜ ਜੀਉਂਦਾ ਹੀ ਮਰ ਗਿਆ। ਅੱਜ ਤੱਕ ਕਿਸੇ ਨੇ ਮੇਰੀ ਪੰਚਾਇਤ ਚ ਗੱਲ ਨਹੀਂ ਸੀ ਮੋੜੀ, ਪਰ ਅੱਜ ਦਿਵਾਨੀ ਦੇ ਬੰਦੇ ਨੇ ਮੇਰਾ ਭਰੀ ਪੰਚਾਇਤ ਚ ਹਝਾ ਲਾਹ ਦਿੱਤਾ। ਓਵੀ ਆਵਦੇ ਜੰਮਿਆਂ ਤੋਂ ਮਿਲੀਆਂ ਠੋਕਰਾਂ ਕਰਕੇ, ਕਰਤਾਰੋ ਮੇਰਾ ਤਾਂ ਹੁਣ ਜੀਣ ਨੂੰ ਜੀਅ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ। ਸਾਰੀ ਉਮਰ ਸਿਰ ਉੱਚਾ ਕਰਕੇ ਤੁਰਿਆ ਲੰਬੜਦਾਰ ਅੱਜ ਸੱਥ ਚ ਜਾਣ ਜੋਗਾ ਵੀ ਨਹੀਂ ਰਿਹਾ। ਹੋਰ ਕਿ ਕੀ ਵਖਾਵੇਂਗਾ ਰੱਬਾ? ਸਾਰੀ ਉਮਰ ਟੋਹਰ ਨਾਲ ਕੀਤੀ ਬੁੱਢੇ ਵਰ੍ਹੇ ਰੁਲਗੀ ਲੰਬੜਦਾਰੀ,, ਤੇ ਭੁੱਬਾ ਮਾਰਦਾ ਲੰਬੜਦਾਰ ਕਹਿਣ ਲੱਗ ਪਿਆ  ਚੱਕਲਾ ਓਏ ਰਬਾ ਚੱਕਲਾ । ਉੱਚੀ ਉੱਚੀ ਭੁੱਬਾਂ ਮਾਰਦੇ ਲੰਬੜਦਾਰ ਨੂੰ ਦਿੱਲ ਦਾ ਦੌਰਾ ਪੈ ਗਿਆ ਅਤੇ ਲੰਬੜਦਾਰ ਨੂੰ ਸਾਹ ਚਲਣੇ ਬੰਦ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਨੇ ਤੇ ਫ਼ੇਰ ਸਾਰਾ ਪਰਿਵਾਰ ਲੰਬੜਦਾਰ ਨੂੰ ਰੋਣ ਲੱਗ ਪੈਂਦਾ ਹੈ।


    ਕਹਾਣੀਕਾਰ

 ✍️ਪਾਗਲ ਸੁੰਦਰਪੁਰੀਆ

9649617982

Monday, 12 April 2021

ਮਾੜਿਆਂ ਨੂੰ ਸਲਾਹ

 ਕਿੱਸਾ ਪਾਗਲ ਦਾ

ਆਪਾਂ ਇੱਕ ਗੱਲ ਅੱਜ ਕੱਲ ਅਕਸਰ ਸੁਣਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਤਕੜੇ ਲੋਕ ਮਾੜੇ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਕਰਦੇ ਹੈ ਜਾਂ ਕਹਿ ਲਈਏ "ਹਮੇਸ਼ਾ ਤਕੜੇ ਮਾੜੇ ਨੂੰ ਦੱਬ ਕੇ ਰੱਖਦੇ ਹਨ।

ਪਹਿਲਾਂ ਏ ਗੱਲ ਮੈਂ ਖੁੱਦ ਵੀ ਮੰਨਦਾ ਸੀ ਪਰ ਹੁਣ ਨਹੀਂ  ਕਿਉਂਕਿ ਆਰਥਿਕ, ਸਮਾਜਿਕ, ਮਾਨਸਿਕ ਅਤੇ ਸ਼ਰੀਰਕ ਤੌਰ ਤੇ ਮਾੜਾ (ਕਮਜ਼ੋਰ) ਇਨਸਾਨ ਏ ਮਹਿਸੂਸ ਕਰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਓ ਬਹੁਤ ਕਮਜ਼ੋਰ ਹੈ ਜੇ ਕੋਈ ਮੁਸੀਬਤ ਉਸ ਤੇ ਆ ਗਈ ਤਾਂ ਓ ਕਿ ਕਰੇਗਾ ਇਸ ਲਈ ਉਹਨੂੰ ਸਹਾਰੇ ਦੀ ਲੋੜ ਮਹਿਸੂਸ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਆਪਣੀ ਲੋੜ ਨੂੰ ਪੂਰੀ ਕਰਨ ਲਈ ਇੱਕ ਸਹਾਰਾ ਲੱਭਦਾ ਹੈ ਤੇ ਓ ਸਹਾਰਾ ਆਪਣੇ ਤੋਂ (ਆਰਥਿਕ, ਸਮਾਜਿਕ, ਮਾਨਸਿਕ ਅਤੇ ਸ਼ਰੀਰਕ ਤੌਰ ਤੇ ) ਤਾਕਤਵਰ ਇਨਸਾਨ ਨੂੰ ਬਣੋਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਚਾਪਲੂਸੀ ਕਰਨੀ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੰਦਾ ਹੈ ਕਿਉਂਕਿ ਲੋੜ ਤਕੜੇ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਮਾੜੇ ਨੂੰ ਹੈ ਤੇ ਚਾਪਲੂਸੀ ਵੀ ਫੇਰ ਮਾੜਾ ਹੀ ਕਰਦਾ। ਜਦੋਂ ਚਾਪਲੂਸੀ ਕਰਨ ਲੱਗਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਸਮਝ ਲੈਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਕਿ ਓ ਇਨਸਾਨ ਆਪਣੇ ਮੂਲ ਵਿਚਾਰਾਂ ਨੂੰ ਕਿਸੇ ਦਾ ਗ਼ੁਲਾਮ ਕਰ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਗ਼ੁਲਾਮੀ ਤਾਂ ਗ਼ੁਲਾਮੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਚਾਹੇ ਵਿਚਾਰਿਕ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਸ਼ਰੀਰਕ,, ਫੇਰ ਓ ਇਨਸਾਨ ਗ਼ੁਲਾਮੀ ਦੀਆਂ ਜੰਜੀਰਾਂ ਪਾਕੇ ਤਕੜੇ ਇਨਸਾਨ ਦੇ ਪੈਰਾਂ ਥੱਲੇ ਦੱਬਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ਅਤੇ ਆਪਣਾ ਸ਼ੋਸ਼ਣ ਕਰਵੋਂਦਾ ਰਹਿੰਦਾ। ਜੇ ਮਾੜਾ ਇਨਸਾਨ ਤਕੜੇ ਦੇ ਥੱਲੇ ਦੱਬਿਆ ਹੋਇਆ ਏ ਉਸਦਾ ਖੁੱਦ ਦਾ ਕਸੂਰ ਹੈ। ਤਕੜੇ ਨੂੰ ਕਿਸ ਗੱਲ ਦਾ ਦੋਸ਼ ?

ਮੈਂ ਏ ਕਹਿਣਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ ਤੁਸੀਂ ਕਿੰਨੇ ਵੀ ਆਰਥਿਕ, ਸਮਾਜਿਕ, ਮਾਨਸਿਕ ਅਤੇ ਸ਼ਰੀਰਕ ਤੌਰ ਤੇ ਮਾੜੇ ਹੋਂ ਕਿਸੇ ਦਾ ਸਹਾਰਾ ਨਾ ਲੱਭੋ, ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਅਪਣਾ ਸਹਾਰਾ ਬਣਾਓ, ਏ ਕਰੋਂਗੇ ਤਾਂ ਤੁਹਾਡੇ ਆਪਣੇ ਵਿਚਾਰ ਜਿੰਦਾ ਰਹਿਣਗੇ, ਮੈਂ ਦਾਅਵੇ ਨਾਲ ਕਹਿ ਸੱਕਦਾ ਹਾਂ ਕਿ ਕੋਈ ਕਿੰਨਾ ਵੀ ਤਕੜਾ ਹੋਵੇ ਤੁਹਾਨੂੰ ਦੱਬ ਨਹੀਂ ਸਕੂਗਾ,,

ਮੈਂ ਇੱਕ ਦਿਨ ਪਹਿਲਾਂ ਦਾ ਇੱਕ ਕਿੱਸਾ ਦੱਸਦਾ ਹਾਂ ਜਦੋਂ ਮੈਨੂੰ ਇਸ ਗੱਲ ਦੀ ਸੋਝੀ ਪਈ,,।


ਮੈਂ ਸੱਤ ਦਿਨ ਪਹਿਲਾਂ ਸੈਕੜਾਂ ਮੁਰਗ਼ੀ ਦੇ ਚੂਜੇ ਲੈਕੇ ਆਇਆ ਹਾਂ, ਓਹਨਾਂ ਦੀ ਸਾਂਭ ਸੰਭਾਲ ਮੈਂ ਖੁੱਦ ਕਰਦਾ ਹਾਂ ਓਹਨਾਂ ਦਾ ਰਹਿਣਾ, ਖਾਣ, ਦਵਾਈ ਦਾ ਪੂਰਾ ਬੰਦੋਬਸਤ ਦਿਨ ਵਿੱਚ ਕਈ ਵਾਰੀ ਵੇਖਦਾ ਹਾਂ, ਫਿਰ ਵੀ ਕਈ ਚੂਜੇ ਮਰ ਰਹੇ ਸੀ। ਮੈਂ ਕਈ ਮਾਹਰ ਡਾਕਟਰਾਂ ਨਾਲ ਗੱਲ ਕੀਤੀ ਓਹਨਾਂ ਦੀ ਦੱਸੀ ਦਵਾਈ ਚਾਲੂ ਕਰਤੀ ਡਾਕਟਰਾਂ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਸੀ ਕਿ ਚੂਜੇ ਕਮਜ਼ੋਰ ਹਨ। ਮੈਂ ਰਾਤ ਨੂੰ ਰੋਟੀ ਖਾਣ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਰੋਜ਼ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਓਹਨਾਂ ਕੋਲ ਗੇੜਾ ਮਾਰਨ ਗਿਆ ਤੇ ਓਹਨਾਂ ਵੱਲ ਵੇਖਕੇ ਮੇਰਾ ਮਨ ਉਦਾਸ ਹੋ ਗਿਆ ਤੇ ਕੁੱਝ ਸਮਾਂ ਮੇਰਾ ਓਹਨਾਂ ਕੋਲ ਬੈਠਣ ਨੂੰ ਦਿੱਲ ਕੀਤਾ ਤੇ ਮੈਂ ਬਹਿ ਗਿਆ। ਕੁਝ ਮਿੰਟਾਂ ਵਿੱਚ ਚੁਜੇ ਇੱਕ ਜਗ੍ਹਾ ਤੇ ਦੀਵਾਰ ਆਲੇ ਪਾਸੇ ਕੱਠੇ ਹੋਣੇ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਏ ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਫੋਨ ਦਾ ਕੈਮਰਾ ਚਾਲੂ ਕਰ ਲਿਆ ਤੇ ਵੇਖਿਆ ਕਿ ਮਾੜੇ ਚੁਜਿਆਂ ਨੂੰ ਸੌਣ ਵੇਲੇ ਦੋ ਚੀਜਾਂ ਦੀ ਲੋੜ ਮਹਿਸੂਸ ਹੋਈ, ਇੱਕ ਗਰਮਾਹਟ, ਦੂਜੀ ਸਿੱਧਾ ਬੈਠਕੇ ਸੌਣ ਵਾਸਤੇ ਆਸੇ ਪਾਸੇ ਸਹਾਰਾ, ਤੇ ਆਪਣੀ ਲੋੜ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰਨ ਲਈ ਓ ਤਕੜੇ ਚੂਜਿਆਂ ਦੇ ਵਿੱਚ ਵੜਦੇ ਗਏ, ਹੁਣ ਮਾੜਾ ਚੂਜਾ ਤਾਂ (ਵੱਡੇ) ਤਕੜੇ ਚੂਜਿਆਂ ਦੇ ਉੱਤੇ ਚੜ੍ਹ ਨਹੀਂ ਸੱਕਦੇ, ਜੇ ਚੜਣਗੇ ਤਾਂ ਤਕੜੇ

ਹੀ ਚੜਣਗੇ,, ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮਾੜੇ ਚੂਜੇ ਤਕੜਿਆਂ ਦੇ ਥੱਲੇ ਦੱਬੇ ਗਏ, ਮੇਰੇ ਫੋਨ ਦੇ ਕੈਮਰੇ ਵਿੱਚ ਰਿਕੌਰਡ ਹੁੰਦਾ ਰਿਆ, ਫ਼ਿਰ ਮੈਂ ਹੱਥੋ ਹੱਥ ਮਾੜੇ ਚੂਜੀਆਂ ਨੂੰ ਅੱਡ ਤੇ ਤਕੜਿਆਂ ਨੂੰ ਅੱਡ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਅਗਲੀ ਸਵੇਰ ਵੇਖਿਆ ਤਾਂ ਸੱਭ ਸਹੀ ਸਲਾਮਤ ਸਨ।


ਓ ਜਾਨਵਰ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਹੈ ਓਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸੰਭਾਲ ਲਿਆ ਤੇ ਓ ਮਰਨੋਂ ਬੱਚ ਗਏ,,


ਇਨਸਾਨ ਕੋਲ ਤਾਂ ਜਾਨਵਰ ਤੋਂ ਬੁੱਧੀ ਵੀ ਜਿਆਦਾ ਹੈ ਤੇ ਸਾਧਨ ਵੀ ਫ਼ੇਰ ਕਿਓਂ ਨਹੀਂ ਤਕੜਿਆਂ ਥੱਲੇ ਦੱਬ ਕੇ ਮਰਨ ਤੋਂ ਬੱਚ ਸਕਦਾ,,।

ਇਸਲਈ ਆਪਣੇ ਵਿਚਾਰ ਜਿੰਦਾ ਰੱਖੋ, ਤਕੜਿਆਂ ਦੀ ਚਾਪਲੂਸੀ ਛੱਡੋ, ਖੁੱਦ ਦਾ ਸਹਾਰਾ ਖੁੱਦ ਬਣੋ,, ਕੋਈ ਵੀ ਤਕੜਾ ਕਿਸੇ ਮਾੜੇ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਦੱਬ ਸੱਕਦਾ ।


✍️ ਪਾਗਲ ਸੂੰਦਰਪੁਰੀਆ

Whatsapp 9649617982


Wednesday, 31 March 2021

मजबूरी

उसी का नाम मजबूरी है "सुंदरपुरीया"

जो गधे को बाप अक्सर कहती है ।

✍️पागल सुंदरपुरीया

Tuesday, 30 March 2021

ਟੁੱਟਿਆ ਦਿੱਲ

 ਹੁਣ ਸੁਣੀਆਂ ਸਾਨੂੰ ਚੇਤੇ ਕਰਕੇ ਸੱਜਣਾਂ ਰੋਂਦਾ ਏਂ

ਜੱਦ ਕੋਲ ਸੀ ਤੇਰੇ ਲਾਹ ਲਾਹ ਮੈਨੂੰ ਸੁੱਟਦਾ ਰੀਆ

ਹੁਣ ਤੇਰਾ ਟੁੱਟਿਆ ਦਿੱਲ ਨਾਂ ਤੈਥੋਂ ਸਹਿਣ ਹੋਵੇ

ਮੇਰਾ ਦਿੱਲ ਤਾਂ ਰੋਜ਼ ਹੀ ਸੱਜਣਾਂ ਟੁੱਟਦਾ ਰੀਆ


ਹੱਥ ਫੜਕੇ ਅਸੀਂ ਤੇਰਾ ਸੱਜਣਾਂ ਅਕਸਰ ਤੁਰਦੇ ਸੀ

ਤੇਰੇ ਓਦੋਂ ਪੈਰ ਕਿਓਂ ਚੰਦਰੇ ਗੈਰਾਂ ਵੱਲ ਮੁੜਦੇ ਸੀ

ਅੱਖਿਓਂ ਹੰਜੂ ਕਿਰ ਜਾਂਦੇ ਦੁੱਖ ਝੱਲਿਆ ਨਾ ਜਾਂਦਾ

ਪਿਆਰ ਸਾਡੇ ਦਾ ਗੱਲ ਤੂੰ ਜਾਣਕੇ ਘੁੱਟਦਾ ਰੀਆ

ਹੁਣ ਤੇਰਾ ਟੁੱਟਿਆ ਦਿੱਲ ਨਾਂ ਤੈਥੋਂ ਸਹਿਣ ਹੋਵੇ

ਮੇਰਾ ਦਿੱਲ ਤਾਂ ਰੋਜ਼ ਹੀ ਸੱਜਣਾਂ ਟੁੱਟਦਾ ਰੀਆ


ਮੇਰੇ ਸਾਦੇਪਣ ਨੂੰ ਸੀ ਓਦੋਂ ਟੀਚਰਾਂ ਕਰਦਾ ਵੇ

ਚਕਮਿਆਂ ਨਾਰਾਂ ਤੇ ਸੀ ਓਦੋਂ ਬਾਹਲਾ ਮਾਰਦਾ ਵੇ

ਕੱਢਕੇ ਆਪਣਾ ਮਤਲਬ ਜਦ ਤੁਰਗਈਆਂ ਤੇਰੇ ਤੋਂ

ਤੂੰ ਫ਼ੇਰ ਯਾਰਾਂ ਤੋਂ ਮੇਰੇ ਬਾਰੇ ਪੁੱਛਦਾ ਰੀਆ

ਹੁਣ ਤੇਰਾ ਟੁੱਟਿਆ ਦਿੱਲ ਨਾਂ ਤੈਥੋਂ ਸਹਿਣ ਹੋਵੇ

ਮੇਰਾ ਦਿੱਲ ਤਾਂ ਰੋਜ਼ ਹੀ ਸੱਜਣਾਂ ਟੁੱਟਦਾ ਰੀਆ


ਸੁਣਲੈ ਸੁੰਦਰਪੁਰੀਆ ਅਸੀਂ ਅੱਜ ਵੀ ਤੇਰੇ ਹਾਂ

ਆਕੇ ਸੀਨੇ ਲੱਗਜਾ ਜਿੰਦ ਕਰਦੇ ਮੇਰੇ ਨਾਂ

ਪਛਤਾਵਾ ਤੈਨੂੰ ਆਪਣੇ ਤੇ ਬੀਤੀਆਂ ਗਲਾਂ ਦਾ

ਹਿਜ਼ਰ ਤੇਰੇ ਵਿੱਚ ਮਨ ਵੀ ਮੇਰਾ ਧੁੱਖਦਾ ਰੀਆ

ਹੁਣ ਤੇਰਾ ਟੁੱਟਿਆ ਦਿੱਲ ਨਾਂ ਤੈਥੋਂ ਸਹਿਣ ਹੋਵੇ

ਮੇਰਾ ਦਿੱਲ ਤਾਂ ਰੋਜ਼ ਹੀ ਸੱਜਣਾਂ ਟੁੱਟਦਾ ਰੀਆ

✍️ਪਾਗਲ ਸੁੰਦਰਪੁਰੀਆ

Whatsapp

9649617982


ਫੁੱਫੜ

ਭੂਆ ਤੈਨੂੰ ਵਿਆਈ, ਤੇ ਤਾਹੀਂ ਤੂੰ ਬਣਿਆ ਫੁੱਫੜ, ਬਾਪੂ ਬੇਬੇ ਦੱਸਿਆ, ਪਿੱਛੋ ਤਾਹੀਂ ਭੂਆ,ਫੁੱਫੜ, ਬਲੀ ਚੜੇ ਅਸੀਂ ਕੁੱਕੜ, ਤੂੰ ਫੁੱਫੜ ਦਾ ਫੁੱਫੜ.. ਗੱਲ ਕੱਟ ਜਾਵੇਂ ਮੇਰਾ...